फांसी दिए जाने के दस साल बाद भी इराक में ज़िंदा हैं पूर्व राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन की यादें

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नई दिल्ली: “अमेरिका इराक में कभी सफल नहीं होगा क्योंकि अमेरिका इराक की भाषा नहीं समझता है. यहां के इतिहास को नहीं समझता है. अरब के लोगों को नहीं समझता है.” यह बात सद्दाम हुसैन ने पकड़े जाने के बाद अमेरिका के सीआईए एजेंट जॉन निक्सन से कही थी. उस वक्त सद्दाम हुसैन की बातों पर अमेरिका ने गौर नहीं किया. अपने अहंकार से इराक पर हमला किया. सद्दाम हुसैन को पकड़ा और आज के दिन यानी 30 दिसंबर 2006 को सद्दाम को फांसी दे दी.

इराक के हालात और बिगड़ते गए : आज भी सद्दाम की यादें इराक के लोगों बीच ज़िंदा हैं. एक तानाशाही शासक के रूप में सद्दाम ने पूरे इराक में एक भय ज़रूर पैदा किया था लेकिन उसकी मौत के बाद इराक के हालात और बिगड़ते गए. मौजूदा सरकार की विफलता ने यह साबित कर दिया है इराक को शासन करने के लिए सद्दाम हुसैन जैसा राष्ट्रपति चाहिए था. यह बात जॉन निक्सन भी आपने किताब में लिख चुके है. निक्सन ने लिखा है कि इराक को संभालने के लिए सद्दाम हुसैन को छोड़ देना चाहिए था.

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इंटरव्यू में सद्दाम हुसैन क्या कहा था : जिस सामूहिक विनाश हथियार का हवाला देते हुए अमेरिका ने इराक पर हमला किया था वे हथियार इराक में नहीं मिले थे. 24 फरवरी, 2003 में सद्दाम हुसैन ने सीबीएस टीवी को दिए एक इंटरव्यू में कहा था इराक के पास कोई सामूहिक विनाश हथियार नहीं है, जो थे वो नष्ट कर दिए गए हैं और इराक बारे में झूठ फैलाया जा रहा है. यह बात सद्दाम हुसैन 2003 में अमेरिका के द्वारा किया गया हमले के एक हफ्ते पहले कही थी.

दस साल बाद इराक के हालात : सद्दाम को फांसी दिए जाने के बाद आज भी इराक के हालात सामान्य नहीं हो पाए हैं. इस्लामिक स्टेट का ख़ौफ़ इराक के लोगों की मन में है. उत्तरी इराक के मोसुल इलाके में आईएसआईएस का दबदबा है. इराक “बॉडी काउंट के डाटा” की रिपोर्ट के अनुसार इराक में हिंसा की वजह से 2014 में 20000 से भी ज्यादा नागरिकों की जान गई है. जबकि 2015 में 18000 के करीब नागरिक मारे गए. 2016 के पूरे आंकड़े अभी तक नहीं आए लेकिन दिसंबर के महीने तक 15000 से भी ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है. हालांकि हाल ही में इराक और अमेरिका के सैनिकों की संयुक्त सैनिक कार्रवाई में मोसुल से आईएसआईएस को भारी नुकसान हुआ है.

सद्दाम हुसैन को लेकर क्या सोच रहे हैं इराक के लोग : सीएनएन ने इराक के कई लोगों से बात करते हुए सद्दाम हुसैन के बारे में सवाल पूछा. सद्दाम हुसैन को लेकर इराक के लोगों से अलग-अलग प्रतिक्रिया आई है.

अमीना अहमद ने सीएनएन से बात करते हुए कहा कि सद्दाम हुसैन तानाशाह जरूर था लेकिन उसे फांसी देना पूरे इराक के लोगों को फांसी देने जैसा है. अमीना का कहना है सद्दाम हुसैन इराक का राष्ट्रपति था. दूसरे देश से आकर एक राष्ट्रपति को इस तरह फांसी देना ठीक नहीं था. 23 वर्षीय ज़ैद रिदा का कहना है कि जिस दिन हुसैन को फांसी हुई थी, वह उनके
परिवार के लिए खुशी का दिन था. सद्दाम हुसैन के शासन काल में रिदा के परिवारों की काफी नुकसान हुआ था.

इराकी नागरिक सुरूङ का कहना है सद्दाम हुसैन शिया और सुन्नी के बीच घृणा पैदा की थी लेकिन जिस तरह उनकी फांसी को मीडिया में दिखाया गया वह गलत था. सुरूङ ने 10 साल पहले की बातों को याद करते हुए बताया कि जब सद्दाम को फांसी हो गई तब लोग काफी खुश नज़र आ रहे थे और हवा में फायरिंग करते थे. यह कोर्ट का निर्णय था और सही निर्णय था लेकिन लोग जिस तरह पार्टी कर रहे थे, गलत लगा.

निवेने ने सीएनएन से बात करते कहा जब सद्दाम हुसैन को फांसी दी गई, तब वह 18 साल की थी और टीवी में सद्दाम हुसैन की फांसी का प्रसारण देखा. निवेने का कहना है सद्दाम हुसैन को फांसी से वह खुश नहीं थी. फांसी के दौरान उसके परिवार के कई लोग रोने लगे थे. निवेने का कहना है सद्दाम हुसैन से उसकी परिवार को कोई नुकसान नहीं पहुंचाया था. सद्दाम ने ऐसा कई गलत काम किया था जो नहीं करना चाहिए था लेकिन इराक को शासन करने के लिए सद्दाम हुसैन जैसा शासक की जरुरत है. निवेने का कहना है, “मैं और मेरा परिवार मुस्लिम नहीं बल्कि ईसाई है लेकिन सद्दाम हुसैन ने किसी को यह इजाज़त नहीं दिया था कि वह ईसाई लोगों को नुकसान पहुंचाए लेकिन अब हालात ख़राब हैं. ईसाई धर्म के लोगों को मारा जा रहा है. घर से निकाल दिया जाता है.

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